157 साल पहले भी बिहार में उठी थी दहेज के खिलाफ आवाज, मगर इसलिए नहीं हो पाया था सफल

157 साल पहले भी बिहार में उठी थी दहेज के खिलाफ आवाज, मगर इसलिए नहीं हो पाया था सफल

By: Sudakar Singh
December 11, 10:12
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Live Bihar Desk : तिलक-दहेज जैसी कुरीतियों के खिलाफ राज्य में शुरू जागरूकता अभियान की तरह ही 1860 के दशक में भी बिहार में एक समाज सुधार आंदोलन शुरू हुआ था। उस समय राजघरानों और समृद्ध परिवारों के बीच हावी यह कुरीति छोटी जमातों को भी जकड़ने लगी थी। तब मुंशी प्यारेलाल ने कमान संभाली थी।

यह बिहार ही नहीं, देश में दहेज के खिलाफ अनूठा मूवमेंट था। शाहाबाद के गोपालपुर गांव निवासी प्यारेलाल सरकारी नौकरी में थे। नौकरी छोड़कर वे इस आंदोलन में जुट गए। उन्हें पश्चिमोत्तर प्रांत के गवर्नर सर विलियम मूर का खुला समर्थन मिला। इसके अलावा डुमरांव, दरभंगा और हथुआ राज का भी साथ मिला।  

प्यारे लाल दयानंद सरस्वती, केशवचंद सेन, राणाडे सरीखे समाज सुधारकों के समकालीन थे। पर उन्होंने उनकी तरह किसी पंथ की स्थापना नहीं की। उन्होंने ‘सदर अंजुमन ए हिंद’ नामक संगठन की स्थापना की। 1868 में अंजुमन की पहली शाखा आरा में खुली। शीघ्र ही सभी जिलों में शाखाएं फैल गईं। सदस्यों के लिए नियम बने। समृद्धों के लिए तिलक की अधिकतम राशि 125 रु. व बारात की संख्या तय की गई। पटना से प्रकाशित अल-पंच ने इस कुरीति पर प्रहार किया। लिखा कि बेटे वालों के लिए दहेज में कारू का खजाना भी कम है। बांकीपुर के चश्म-ए-इल्म ने 18 नवंबर 1873 में 3 राजाओं व 15 लोगों के बीच इकरारनामे को प्रकाशित किया जिसमें दहेज के खर्च को कम करने की बात थी। 

1876 में प्यारेलाल सौराठ सभा गए। 1877 में अंजुमन के तय मापदंडों के आईने में महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह ने 2,289 शादियों को परखा। (जेएस झा- बायोग्राफी ऑफ लक्ष्मीश्वर सिंह)। सभाओं में प्यारेलाल द्वारा वैवाहिक खर्च को नियंत्रित करने के लिए बनाए नियम स्वीकार किए जाने लगे। इस बीच उनसे एक गलती हो गई। वे एक ऐसी शादी में चले गए जिसमें उनके ही बनाए नियम की धज्जियां उड़ीं। जिस बारात में वे शामिल हुए थे वह दो दिन की थी। इससे नाराज पटना के डिस्ट्रिक्ट जज प्रिंसेप, जो पटना सदर अंजुमन के अध्यक्ष थे, ने विवाह समिति से इस्तीफा दे दिया। पटना के रईसों ने कुलीनता की आड़ में आंदोलन को कमजोर कर दिया।
 

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